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एडल्ट मूवीज़ के सहारे जिंदा हैं असम-बंगाल के सिंगल स्क्रीन थिएटर

NEWSDESK
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कोलकाता के बड़ा बाजार में 41 वर्षीय लल्लन सिंह दिहाड़ी मजदूर का काम करते हैं. वह हर रोज नीले रंग की चरखाना लुंगी में राजा कटरा के एक गोदाम में अनाज की बोरियां ढोने का काम करते हैं. हर रोज जैसे ही घड़ी की सुइयां दोपहर के 12.30 बजे का समय दिखाती हैं लल्लन सिंह रामधानी की ‘फालतू चाय की दुकान’ में जा बैठते हैं. सस्ती दरों पर मिलने वाला खाना खाकर वह फिर काम में जुट जाते हैं. कड़ी धूप में हाड़तोड़ मेहनत के बाद हर शाम लल्लन सिंह स्थानीय शराब की दुकान ‘बंगला’ में जाना नहीं भूलते. लल्लन बिहार के पश्चिमी चंपारण के नरकटियागंज के हैं. वह कोलकाता में अकेले ही रहते हैं. उनका कोई शुक्रवार ऐसा नहीं जाता जब वह ब्लॉकबस्टर शो देखने न जाएं. पिछले सप्ताह उन्होंने ‘जब रात होती है’ देखी थी. लल्लन बताते हैं, ‘बहुत अच्छा सिनेमा था बाबू… सीन, एक्शन सब अच्छा था. थोड़ा टाइम पास हो जाता है.’ वह बताते हैं कि ‘बीबी जवान, मर्द परेशान’ उनकी फेवरेट फिल्म है.

कम ही पहचाना जाता है एडल्ट मूवीज का बाजार
अपने दांतों को टूथपिक से कुरेदते हुए लल्लन ने बताया कि जल्द ही ‘शोला-फायर ऑफ लव’ और ‘मौत फिर आएगी’ रिलीज होने वाली हैं. लल्लन और उनके जैसे हजारों लोगों की वजह से एडल्ट मूवीज का बाजार गुलजार है. ऐसे ही दर्शकों की बदौलत मल्टीस्क्रीन स्क्रीन थिएटर्स के सामने संघर्ष कर रहे सिंगल स्क्रीन सिनेमा भी जिंदा हैं. ‘कबीर सिंह’ जैसी मुख्यधारा की फिल्मों की तरह एडल्ट मूवीज के बाजार के बारे में कम ही लोग जानते हैं. कोलकाता की इक्यूनॉक्स फिल्म सिटी की मालिक झुमा पॉल का कहना है कि वह एडल्ट के साथ सभी तरह की मूवीज में डील करती हैं. डिजिटल मीडिया के दौर में हर तरह की फिल्में आसानी से उपलब्ध हैं. फिर भी एडल्ट मूवीज के बाजार के लिए अभी गुंजाइश बाकी है. हालांकि, मुख्यधारा की फिल्मों के इतर एडल्ट मूवीज के बाजार का कारोबार थोड़ा अलग है. इन मूवीज में कम प्रोडक्शन कॉस्ट के कारण मुनाफा भी कम ही होता है.

पॉल बताती हैं कि एडल्ट मूवीज की प्रोडक्शन कॉस्ट 25 लाख से 35 लाख रुपये के बीच होती है. ज्यादातर फिल्में मुंबई और चेन्नई में बनती हैं. हम एक से तीन साल की रॉयल्टी के लिए करार करते हैं. कंटेट के आधार पर रॉयल्टी अमाउंट 35 हजार रुपये से 2 लाख रुपये तक तय होता है. ‘जब रात होती है’, ‘मदमस्त बरखा’, ‘भयानक आत्मा’ और महेरुह जैसी फिल्मों के साथ इस साल हमने अच्छा कारोबार किया है.

ज्यादातर दर्शक अकेले रहने वाले दिहाड़ी मजदूर
झुमा कहती हैं कि ज्यादातर दर्शक कोलकाता में अकेले रहने वाले दिहाड़ी मजदूर होते हैं. कुछ इलाकों में पति-पत्नी भी एकसाथ एडल्ट फिल्म देखने जाते हैं. सुविधाओं के मुताबिक टिकट की कीमत 30 से 100 रुपये तक रहती है. शहरों के मुकाबले ग्रामीण इलाकों में ऐसी फिल्में ज्यादा कारोबार करती हैं. सरस्वती फिल्म्स के सुभेंदु बिस्वास कहते हैं कि मुख्यधारा की फिल्म शुक्रवार को रिलीज होती है और कुछ हफ्तों में ही मुनाफा दिखाई देने लगता है. इसके उलट एडल्ट मूवीज के मामले में मुनाफा रॉयल्टी का समय शुरू होने और खत्म होने के बीच आंका जाता है.

कई एडल्ट फिल्मों ने किया अच्छा कारोबार
बिस्वास के मुताबिक, एडल्ट मूवीज के कारोबार में सबसे बड़ा फायदा यही है कि इसे सिंगल स्क्रीन थिएटर के मालिकों की मांग पर फिल्म को बार-बार चलाया जा सकता है. बिस्वास को लगता है कि स्टीमी सीन्स के कारण एडल्ट फिल्मों की शेल्फ लाइफ मुख्यधारा की फिल्मों से ज्यादा होती है. वह बताते हैं कि पिछले तीन-चार साल में कई फिल्मों ने अच्छा बिजनेस किया. बंगाल और असम में ‘मुन्नी मैट्रिक पास’ सुपरहिट रही. इसने दोनों राज्यों में 8-10 लाख रुपये का कारोबार किया. वहीं, पूरे देश में 2 करोड़ रुपये से ज्यादा का बिजनेस किया. इसके अलावा ‘एमएमएस कांड’ बड़ी हिट फिल्म रही. बंगाल और असम के 200 से ज्यादा सिंगल स्क्रीन थिएटर्स में यह फिल्म चली.

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