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पशुपालन और मछली पालन से बदल रही सरगुजा के किसानों की तकदीर, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रही नई मजबूती….

News Desk
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रायपुर: छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचलों में अब खेती-किसानी के साथ पशुपालन, डेयरी व्यवसाय और मछली पालन भी आर्थिक समृद्धि के नए रास्ते खोल रहे हैं। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य शासन द्वारा किसानों और ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने, स्वरोजगार के अवसर विकसित करने तथा उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है। शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं, अनुदान आधारित सहायता और विभागीय मार्गदर्शन से ग्रामीण परिवार पारंपरिक कृषि के साथ आजीविका के नए साधन अपना रहे हैं। सरगुजा जिले के किसानों और पशुपालकों की सफलता की कहानियां इस बदलाव की प्रेरक तस्वीर प्रस्तुत कर रही हैं।

सरगुजा जिले में राज्य डेयरी उद्यमिता विकास योजना, पशुधन विकास विभाग की सूकर प्रदाय योजना और ग्रामीण रोजगार योजना के अंतर्गत आजीविका डबरी निर्माण एवं गहरीकरण जैसे कार्य ग्रामीण परिवारों के लिए उपयोगी साबित हो रहे हैं। कहीं डेयरी व्यवसाय से नियमित आमदनी हो रही है, तो कहीं सूकर पालन स्वरोजगार का माध्यम बन रहा है। वहीं जल संरक्षण के लिए विकसित डबरियों से किसानों को सिंचाई, सब्जी उत्पादन और मछली पालन का दोहरा लाभ मिल रहा है। इन गतिविधियों ने ग्रामीण परिवारों को आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित करने और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर दिया है।

डेयरी व्यवसाय ने संध्या को बनाया आत्मनिर्भर, प्रतिमाह 15 हजार रुपये की हो रही बचत

सरगुजा जिले के ग्राम लमगांव निवासी संध्या ने यह साबित किया है कि शासकीय योजनाओं का सही उपयोग और निरंतर मेहनत ग्रामीण महिलाओं के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता का मजबूत आधार बन सकती है। वर्ष 2024 में राज्य डेयरी उद्यमिता विकास योजना के अंतर्गत मिले अनुदान से उन्होंने डेयरी व्यवसाय को आगे बढ़ाया। शासन से प्राप्त सहयोग ने उन्हें गायों के पालन-पोषण और दूध उत्पादन के माध्यम से नियमित आय अर्जित करने का अवसर प्रदान किया।

विशेष लेख : पशुपालन और मछली पालन से बदल रही सरगुजा के किसानों की तकदीर, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रही नई मजबूती

वर्तमान में संध्या की डेयरी से प्रतिदिन लगभग 30 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है। दूध की बिक्री से उन्हें प्रतिदिन करीब 1,200 रुपये की आय प्राप्त होती है। पशुओं के चारे, पानी और अन्य आवश्यक खर्चों को निकालने के बाद वे प्रतिमाह लगभग 15 हजार रुपये की बचत कर रही हैं। इस व्यवसाय से उनकी वार्षिक बचत लगभग एक लाख से डेढ़ लाख रुपये तक पहुंच रही है।

संध्या ने अपनी सफलता को वर्तमान आय तक सीमित नहीं रखा है। वे डेयरी व्यवसाय के भविष्य को लेकर भी योजनाबद्ध तरीके से काम कर रही हैं। गायों से प्राप्त तीन बछियों को भविष्य में प्रजनन के लिए तैयार किया जा रहा है, जिससे आने वाले समय में पशुधन और दुग्ध उत्पादन बढ़ने की संभावना है। उनकी यह पहल बताती है कि ग्रामीण महिलाएं शासकीय सहायता और अपनी मेहनत के बल पर सफल उद्यमी बन सकती हैं।

दो कमरों से शुरू किया सूकर पालन, अनिल ने मेहनत से बनाई स्वरोजगार की राह

सरगुजा जिले के ग्राम शिवनाथपुर निवासी अनिल कुमार खेस की कहानी सीमित संसाधनों से स्वरोजगार शुरू करने की प्रेरक मिसाल है। वर्ष 2018 में पशुधन विकास विभाग की सूकर प्रदाय योजना के अंतर्गत मिली सहायता से उन्होंने महज दो कमरों में सूकर पालन का कार्य प्रारंभ किया। शुरुआती दौर में संसाधन सीमित थे, लेकिन उन्होंने मेहनत, अनुभव और विभागीय मार्गदर्शन के सहारे इस व्यवसाय को आगे बढ़ाया।
अनिल कुमार ने उपलब्ध स्थान का बेहतर उपयोग करते हुए पशुओं की नियमित देखभाल और व्यवसाय के संचालन पर विशेष ध्यान दिया। धीरे-धीरे उन्होंने सूकर पालन को अपनी आजीविका का महत्वपूर्ण माध्यम बनाया।

उनकी सफलता से यह संदेश मिलता है कि स्वरोजगार शुरू करने के लिए हमेशा बड़े निवेश की आवश्यकता नहीं होती। सही योजना, तकनीकी जानकारी और निरंतर प्रयास से छोटे स्तर पर शुरू किया गया व्यवसाय भी आर्थिक मजबूती का आधार बन सकता है। सूकर पालन जैसे पशुधन आधारित व्यवसाय ग्रामीण युवाओं और किसानों के लिए स्वरोजगार के उपयोगी विकल्प बन सकते हैं। अनिल कुमार का अनुभव अन्य ग्रामीण परिवारों को भी उपलब्ध संसाधनों के आधार पर पशुपालन से जुड़ी उद्यमिता अपनाने के लिए प्रेरित कर रहा है।

आजीविका डबरी बनी बाबूनाथ के लिए वरदान, सिंचाई के साथ मछली पालन का मिला अवसर

सरगुजा जिले के अम्बिकापुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम सकालो निवासी किसान बाबूनाथ के लिए आजीविका डबरी का गहरीकरण और मरम्मत खेती-किसानी में नई उम्मीद लेकर आया है। ग्रामीण रोजगार योजना के अंतर्गत डबरी की जल संग्रहण क्षमता बढ़ने से अब उन्हें खेतों की सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध हो रहा है। इससे साग-सब्जियों की खेती आसान हुई है और उपलब्ध भूमि का बेहतर उपयोग संभव हो सका है।
पहले सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती थी।

डबरी के गहरीकरण के बाद जल संग्रहण की सुविधा बेहतर हुई है। अब बाबूनाथ अपने खेत में साग-सब्जियों का उत्पादन कर रहे हैं। इससे परिवार की घरेलू जरूरतें पूरी होने के साथ अतिरिक्त उत्पादन को बाजार में बेचकर आय अर्जित करने का अवसर भी मिल रहा है। सब्जियों की बिक्री से प्राप्त राशि खेती-किसानी से जुड़े खर्चों को पूरा करने में मददगार साबित हो रही है।

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बाबूनाथ ने डबरी में मछली बीज भी डाला है, जिससे उन्हें खेती के साथ मत्स्य पालन का अतिरिक्त अवसर मिला है। अब एक ही जल संसाधन का उपयोग सिंचाई और मछली पालन, दोनों कार्यों के लिए किया जा रहा है। बाबूनाथ बताते हैं कि डबरी में पानी उपलब्ध होने से खेती में काफी सुविधा हुई है और मछली पालन से भी भविष्य में अतिरिक्त आमदनी की उम्मीद है। उनकी कहानी यह दर्शाती है कि जल संरक्षण के लिए निर्मित परिसंपत्तियां केवल पानी संग्रहण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका समुचित उपयोग किसानों के लिए आजीविका के अनेक अवसर विकसित कर सकता है।

अनुपयोगी जमीन बनी आजीविका का साधन, सनी लाल ने शुरू की सब्जी की खेती और मछली पालन

ग्रामीण रोजगार योजना के अंतर्गत निर्मित आजीविका डबरी ने किसान सनी लाल के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव की शुरुआत की है। पहले उनकी जमीन खाली पड़ी रहती थी और उसका समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा था। डबरी निर्माण के बाद वर्षा जल संग्रहण की सुविधा विकसित हुई, जिससे उन्हें खेती और मछली पालन के नए अवसर मिले।

अब सनी लाल डबरी में मछलियां पाल रहे हैं और आसपास की भूमि पर साग-भाजी की खेती भी कर रहे हैं। सब्जी उत्पादन से परिवार की घरेलू जरूरतें पूरी करने में मदद मिल रही है। वहीं डबरी में पाली जा रही मछलियों के तैयार होने के बाद उन्हें बाजार में बेचकर अतिरिक्त आय अर्जित करने की उम्मीद है।

सनी लाल बताते हैं कि डबरी बनने से पहले जमीन का उपयोग सीमित था, लेकिन अब पानी की उपलब्धता से खेती करना आसान हो गया है। सिंचाई की सुविधा मिलने से वे साग-भाजी उगा पा रहे हैं और मछली पालन के रूप में आजीविका का एक नया साधन भी विकसित हुआ है।
यह पहल बताती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण के साथ आजीविका संवर्धन को जोड़कर किसानों के लिए आर्थिक प्रगति के नए अवसर तैयार किए जा सकते हैं। डबरी निर्माण से जल संग्रहण की सुविधा विकसित होने के साथ भूमि की उपयोगिता भी बढ़ रही है।

शासकीय योजनाओं से ग्रामीण उद्यमिता को प्रोत्साहन, कृषि के साथ आय के नए विकल्प

मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य शासन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए कृषि के साथ पशुपालन और मत्स्य पालन जैसी आजीविका गतिविधियों को प्रोत्साहित कर रहा है। इन गतिविधियों के माध्यम से किसानों को आय के अतिरिक्त साधन विकसित करने तथा कृषि पर निर्भरता के साथ अन्य व्यवसायों से भी आर्थिक लाभ प्राप्त करने के अवसर मिल रहे हैं।

राज्य डेयरी उद्यमिता विकास योजना के अंतर्गत पात्र हितग्राहियों को डेयरी व्यवसाय के लिए अनुदान आधारित सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। पशुधन विकास विभाग की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से पशुपालकों को आवश्यक सहयोग और मार्गदर्शन प्रदान किया जा रहा है। इसी प्रकार ग्रामीण रोजगार योजना के अंतर्गत डबरी निर्माण एवं गहरीकरण जैसे कार्यों से जल संरक्षण के साथ सिंचाई और मत्स्य पालन की संभावनाओं को बढ़ावा मिल रहा है।

इन योजनाओं की विशेषता यह है कि ग्रामीण परिवार अपनी स्थानीय परिस्थितियों, उपलब्ध भूमि, जल संसाधनों और क्षमता के अनुरूप आजीविका के साधन विकसित कर सकते हैं। डेयरी व्यवसाय से नियमित आय, सूकर पालन से स्वरोजगार तथा डबरी आधारित खेती और मछली पालन से अतिरिक्त आमदनी की संभावनाएं ग्रामीण अर्थव्यवस्था को विविधता प्रदान कर रही हैं।

जल संरक्षण और पशुधन आधारित आजीविका से आत्मनिर्भर गांवों की ओर बढ़ते कदम

सरगुजा जिले के संध्या, अनिल कुमार खेस, बाबूनाथ और सनी लाल जैसे हितग्राहियों के अनुभव ग्रामीण विकास की उस सकारात्मक तस्वीर को सामने लाते हैं, जिसमें शासकीय योजनाएं लोगों को आत्मनिर्भर बनने के अवसर प्रदान कर रही हैं। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि आर्थिक सहायता के साथ तकनीकी मार्गदर्शन, उपलब्ध संसाधनों का समुचित उपयोग और हितग्राहियों की मेहनत ग्रामीण आजीविका को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

डेयरी और सूकर पालन जहां ग्रामीण परिवारों को पशुधन आधारित उद्यमिता से जोड़ रहे हैं, वहीं आजीविका डबरियां जल संरक्षण के साथ सब्जी उत्पादन और मत्स्य पालन के अवसर विकसित कर रही हैं। इससे किसानों को अपनी भूमि और जल संसाधनों का बेहतर उपयोग करने में मदद मिल रही है।

सरगुजा के किसानों की ये प्रेरक कहानियां बताती हैं कि शासकीय योजनाओं का लाभ जब ग्रामीणों की मेहनत और उद्यमशीलता से जुड़ता है, तो आत्मनिर्भरता के नए रास्ते खुलते हैं। खेती के साथ पशुपालन और मछली पालन जैसी गतिविधियों का विस्तार ग्रामीण परिवारों की आर्थिक मजबूती, स्वरोजगार और समृद्ध गांवों के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल साबित हो रहा है।

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