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रायपुर : सुर, संगम और समर्पण से सजी रजत महोत्सव की संध्या

News Desk
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संगीत की सुरमयी शाम में झूम उठा राज्योत्सव मैदान

 रायपुर

छत्तीसगढ़ रजत महोत्सव की सांस्कृतिक संध्या में सोमवार की रात संगीत, नृत्य और लोक संस्कृति का अनोखा संगम देखने को मिला। बॉलीवुड की ख्यातनाम पार्श्व गायिका भूमि त्रिवेदी ने अपनी मनमोहक आवाज़ से दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने “ससुराल गेंदा फूल”, “सैय्यारा”, “राम चाहे लीला”, “झुमका गिरा रे” "जय-जय शिवशंकर-कांटा लगे न कंकड़", "होली खेले रघुवीरा", "रंग बरसे", "ये देश है वीर जवानों का".."डम-डम ढोल बाजे", "उड़ी-उड़ी जाएं" जैसे लोकप्रिय गीतों को अपने नए अंदाज़ में प्रस्तुत कर माहौल को जोश और उमंग से भर दिया। हिंदी, पंजाबी और राजस्थानी सहित अन्य राज्यों के भाषाओं के धुनों के साथ छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत का ताना-बाना जोड़ते हुए उन्होंने युवाओं के दिलों में संगीत की हलचल मचा दी। दर्शकों की तालियों और नृत्य से पूरा प्रांगण गूंज उठा।

पंडवानी की वीरता और सूफी संगीत की रूहानी छुअनपंडवानी की वीरता और सूफी संगीत की रूहानी छुअन

छत्तीसगढ़ की गौरवगाथा को आगे बढ़ाते हुए पद्मश्री श्रीमती ऊषा बारले ने अपने तानपुरे की झंकार और अभिव्यक्तिपूर्ण मुद्राओं से महाभारत की वीरता को जीवंत कर दिया। उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं को भावविह्वल कर दिया और वे देर तक मंच से नज़रें नहीं हटा सके। उन्होंने महाभारत के चीरहरण की घटनाओं को मार्मिक और ह्रदयस्पर्शी ढंग से प्रस्तुत किया।

इसके बाद सूफी पार्श्व गायक राकेश शर्मा और उनकी टीम ने “दमादम मस्त कलंदर”, “मौला मेरे मौला”, “चोला माटी के राम” जैसे गीतों से श्रोताओं को रूहानी सफर पर ले गए। उनकी साथी गायिका निशा शर्मा और कलाकारों ने भी अपने स्वर और लय से इस सूफियाना माहौल को और प्रगाढ़ बनाया।

माटी की खुशबू और लोकनृत्य की छटामाटी की खुशबू और लोकनृत्य की छटा

प्रादेशिक लोकमंच के कलाकार कुलेश्वर ताम्रकार ने नाचा के माध्यम से छत्तीसगढ़ की माटी में रची-बसी लोकसंस्कृति को मंच पर साकार किया। उनके प्रदर्शन ने परंपरा, ऊर्जा और रचनात्मकता का ऐसा संगम रचा कि दर्शक देर तक तालियां बजाते रहे और दर्शकदीर्घा में मुस्कान के साथ थिरकते रहे।

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