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दिल्ली हाईकोर्ट ने आयुष्मान भारत योजना को लागू न करने पर दिल्ली सरकार को फटकार लगाई

News Desk
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दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को दिल्ली में आयुष्मान भारत योजना को लागू करने संबंधीत एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली के स्वास्थ्य सिस्टम पर सवाल खड़ा किया. कोर्ट ने कहा कि दिल्ली में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति ठीक नहीं है. अस्पतालों में आवश्यक और अत्याधुनिक सुविधाओं की कमी है, यहां तक कि मरीजों के लिए सीटी स्कैन जैसी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं. कोर्ट ने पूछा कि केंद्र सरकार से मदद लेने में क्या दिक्कत है.

दिल्ली सरकार को आयुष्मान भारत योजना लागू करने का आदेश
कोर्ट की यह टिप्पणी BJP सांसदों की याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई. दरअसल, दिल्ली सरकार ने केंद्र शासित प्रदेश में भारत सरकार की आयुष्मान भारत योजना लागू नहीं की है. इसके खिलाफ दिल्ली के सातों सांसदों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर मांग की है कि कोर्ट दिल्ली सरकार को इसे लागू करने का आदेश दे, ताकि दिल्ली के लोग इसका लाभ उठा सकें. सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार के वकील ने कहा कि उन्हें याचिका की कॉपी नहीं मिली है, जिस पर कोर्ट ने वकील को कॉपी उपलब्ध कराने का आदेश दिया. मामले की अगली सुनवाई गुरुवार को होगी.

आयुष्मान योजना लागू न करने के पीछे राजनीति
BJP सांसद बांसुरी स्वारज ने आम आदमी पार्टी (AAP) पर हमला करते हुए कहा कि आयुष्मान योजना के तहत संचालन का अनुपात 60/40 है, यानी 60 प्रतिशत पैसा केंद्र सरकार देगी और 40 प्रतिशत राज्य सरकार देगी, फिर भी दिल्ली सरकार इस योजना को लागू नहीं कर रही है. उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री के बयान का हवाला देते हुए कहा कि यदि यह योजना दिल्ली में लागू हो जाती, तो केंद्र दिल्ली सरकार को सालाना 47 करोड़ रुपये देता, लेकिन राजनीति के चलते आम आदमी पार्टी इसे लागू नहीं कर रही है.

36 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों ने आयुष्मान भारत लागू
BJP सांसदों द्वारा दायर याचिका में कहा गया है कि देश के 36 प्रदेशों और केंद्र शासित प्रदेशों ने इसे लागू किया है, लेकिन दिल्ली सरकार इसे लागू नहीं कर रही है. इस याचिका में यह भी कहा गया है कि दिल्ली सरकार ने 2020-21 के बजट भाषण में इसे लागू करने की बात की थी, लेकिन बाद में वह इससे मुकर गई है. याचिका में यह भी कहा गया है कि दिल्ली में इसे लागू न करने का फैसला संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) के तहत मूल अधिकारों का उल्लंघन है.

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