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नेताजी जरा हटके: कभी नहीं देखा स्‍कूल, फिर भी बने मंत्री, इस बार गढ़ बचा पाने की चुनौती

NEWSDESK
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छत्‍तीसगढ़ के कोंटा से विधायक कवासी लखमा क्‍या इस बार अपना अभेद किला फिर बचा पाएंगे? रविवार को छत्‍तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2023 का परिणाम आ रहा है.

कवासी लखमा के बिना छत्तीसगढ़ की राजनीति की चर्चा पूरी नहीं हो सकती. लखमा के नाम के साथ सलवा जूडृम भी चर्चा में है. चर्चा में आती उनकी ठेठ आदिवासी शैली. कवासी लखमा छत्तीसगढ़ के जिस बस्तर के इलाके से हैं वह नक्सली गतिविधियों के कारण चर्चा में बना रहता है. कवासी लखमा कभी स्कूल नहीं गए लेकिन आदिवासी जीवन की पाठशाला ने उन्हें बहुत कुछ सिखाया. उनकी आदिवासी शैली पर बाहरी दुनिया का कोई असर नजर नहीं आता. वे दूसरे नेताओं की तरह शराबबंदी लागू करने की बात नहीं करते. लखमा कोंटा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे हैं. कोंटा, सुकमा जिले में आता है. लखमा ने अपनी राजनीति की शुरुआत पंच से शुरू की थी. पांच बार कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़कर जीत चुके हैं.

विधानसभा का पहला चुनाव 1998 में लड़ा था. उस वक्त छत्तीसगढ़ अलग राज्य नहीं बना था. भारतीय जनता पार्टी तब से अब तक इस सीट को लखमा से नहीं छिन पाई है. कोंटा में लखमा का मुकाबला सीपीआई के उम्मीदवार मनीष कुंजाम से दिखाई दे रहा है. कुंजाम को तकनीकी कारणों से पार्टी का सिंबल नहीं मिल पाया. वे निर्दलीय सिंबल पर चुनाव लड़ रहे हैं. भाजपा ने इस सीट पर शेयाम मूका को उम्मीदवार बनाया है.

कवासी लखमा की इस क्षेत्र में ताकत क्या है? यह एक ऐसा सवाल इसका जवाब पक्ष-विपक्ष के किसी भी नेता को आज तक नहीं मिला है. लखमा जब आदिवासियों के बीच जाते हैं तो उनके जैसे बन जाते हैं. युवाओं को बीड़ी पीकर नाक से धुआं निकालने की कला भी वे सीखाने से पीछे नहीं रहते. चुनाव से पहले जब वे अपनी तीस साल पुरानी उधारी चुकाते देखे गए तो उसकी भी खूब चर्चा रही. उधारी पर उन्होंने बैल खरीदे थे. चर्चा में वे मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पर दिए गए बयान के कारण भी आए. पांच बार के आदिवासी विधायक होने के बाद भी उन्होंने कोई दावेदारी मुख्यमंत्री पद पर नहीं की है.

कवासी लखमा पढ़े-लिखे नहीं हैं. इस कारण उनके विरोधी यह सोच ही नहीं पाते थे कि वे कभी मंत्री भी बन सकते हैं. वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ की पहली सरकार अजित जोगी के नेतृत्व में बनी थी. कवासी लखमा पहली बार के विधायक थे. इस कारण मंत्री नहीं बन पाए. इसके बाद लगातार भाजपा की सरकार रही. 2018 में भूपेश बघेल के नेतृत्व में सरकार बनी तो उन्हें आबकारी और उद्योग विभाग दिया गया. उन्होंने मंत्री पद की शपथ पढ़ कर नहीं तत्कालीन राज्यपाल आनंदी बेन पटेल के शब्द सुनकर ली.

कवासी लखमा की बड़ी ताकत उनका अपने मूल से जुड़कर रहना है. वे कभी आदिवासी त्यौहारों पर लगने वाले मेलों में खुद पर कोड़े बरसाते दिखाई देते हैं तो कभी मोटरसाइकिल से क्षेत्र में एक गांव से दूसरे गांव जाते देखे जा सकते हैं. कवासी लखमा उन बचे हुए कांग्रेसियों में एक हैं जिन पर नक्सलियों ने 2013 में हमला किया था. कांग्रेस के सभी बड़े नेता इस हमले में मारे गए थे. लखमा बच गए तो भाजपा ने उनके नार्को टेस्ट की मांग उठाकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश भी की लेकिन क्षेत्र के विकास से जुड़े किसी मामले में यदि दलीय प्रतिबद्धता से ऊपर जाना पड़ता है तो लखमा के लिए यह मुश्किल नहीं होता.

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