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70 साल की शुभांगी आप्टे ने छेड़ी पॉलीथिन के विरुद्ध जंग…

NEWSDESK
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पॉलीथिन के विरुद्ध जंग की दो कहानियां

कॉमन इंट्रो- मोदी सरकार बापू की जयंती से देश भर में प्लास्टिक मुक्त भारत अभियान की शुरुआत करने जा रही है। हमारे रायपुर में कुछ लोग हैं, जिन्होंने पॉलीथिन के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। इनके प्रयास कुछ हद तक पॉलीथिन को हर व्यक्ति के हाथ में जाने से रोक रहे हैं, लोग जागरूक हो रहे हैं और कपड़े, जूट के थैलों का इस्तेमाल कर रहे हैं। पढ़ें, ये दो कहानियां…।

70 साल की शुभांगी आप्टे ने बीते छह साल से पॉलीथिन के विरुद्ध मुहिम छेड़ रखी है। अपले दम पर वे यह लड़ाई लड़ रही हैं। इसमें न तो कोई एनजीओ की मदद है और न ही किसी संस्था से पैसे लिए हैं। बजट वे अपने खर्च में कटौती कर जुटाती हैं और इसी से वे कपड़े खरीदती हैं। उसके थैले बनाकर लोगों को बांटती हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि वे 31 हजार थैलियां बांट चुकी हैं। उनका यह काम लगातार जारी है। वे कहती हैं कि आप किसी सोच को लेकर आगे बढ़ते हैं, अगर वह सही है और उससे समाज का हित होता है तो लोग जुड़ते चले जाते हैं।

जब उनसे सवाल किया कि उन्हें इसकी प्रेरण कहां से मिली तो उनका जवाब सुनिए- मैंने अखबारों के माध्यम से पढ़ा कि गऊ माता इन्हें खाकर बीमार पड़ रही हैं,उनकी जान जा रही है। भूमि बंजर हो रही है। इसके बाद मैंने सोचा कि क्यों न पॉलीथिन बैग का बहिष्कार करूं और कपड़े के थैले को बढ़ावा दूं। बस वहीं से करवां चल पड़ा।’ पॉलीथिन के विरुद्ध उनकी लड़ाई को सराहा जाता है। उन्हें कई पुरस्कार मिले। उन्हें खुशी है कि मोदी सरकार अब पॉलीथिन को दुश्मन मानकर अभियान शुरू करने जा रही है।

पुराने कपड़ों का करें सदुपयोग- वे कहती हैं कि हम पुराने कपड़ों को फेंक देते हैं या आलमारी में रख देते हैं। अगर इनका इस्तेमाल बैग बनाने में किया जाए तो कितना अच्छा होगा। कपड़ों का सदुपयोग हो जाएगा। उन्होंने कहा कि मैंने 10 साल से सोना-चांदी नहीं खरीदा, क्योंकि खरीदेंगे तो वह बैंक में लॉकर में रखना होता है, पहनते हैं गारंटी वाले जेवर। फिर खरीदना ही क्यों? महंगी साड़ी क्यों पहनना? इसका पैसा बचता है, वही बैग बनाने में काम आता है। वे लोगों के घरों से कतरन भी मांगती हैं, ताकि उसका भी इस्तेमाल कर सकें।

स्कूलों में जाकर करती हैं जागरूक- शुभांगी आप्टे ने पॉलीथिन के विरुद्ध लोगों में जागरूकता लाने का भी अभियान छेड़ रखा है। वे स्कूलों में जाकर बच्चों को जागरूक करती हैं। महिलाओं को प्रेरित करती हैं कि वे भी कपड़े के थैलों का ही इस्तेमाल क

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