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छत्तीसगढ़ : पहले मेयर बने अशोक राव, जिन्होंने निगम को दिया, लिया कुछ नहीं…

NEWSDESK
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 छत्तीसगढ़ की बिलासपुर नगर पालिका निगम का गठन 1 जनवरी 1981 को हुआ था। उन दिनों पार्षद किसी भी गणमान्य नागरिक को मेयर चुन सकते थे। नगर पालिक निगम अधिनियम में निर्वाचित परिषद के बाहर के व्यक्ति को महापौर चुनाव में भाग लेने का अधिकार दिया गया था। दलीय व्यवस्था के मुताबिक सदन में जिनका बहुमत होता था, उनके प्रत्याशी चुन लिए जाते थे। ई. अशोक राव नगर निगम के पहले मेयर चुने गए। राव साहब ने निगम के इतिहास में कई कीर्तिमान रचे। वह पहले राजनेता थे, जिन्होंने निगम को अपनी ओर से दिया, लिया कुछ नहीं। उनकी दरियादिली की किस्से टाउनहाल के गलियारों में आज भी सुने जाते हैं। 

मानदेय की राशि से कर्मचारी कल्याण निधि बनाई 

  1. अशोक राव निश्छल व्यक्ति थे। पारिवारिक रूप से प्रतिष्ठित परिवार से आऩे के कारण वह अपने बनाए कायदे पर चलते रहे। टाउनहाल के बैठक कक्ष में अपने बैठने के लिए घर के कुर्सी मंगवाई। शासन को जो चिट्ठियां लिखते थे, उसका डाक खर्च भी स्वयं चुकाते थे। मानदेय की राशि से कर्मचारी कल्याण कोष की स्थापना की, जो कर्मचारियों के परिवार, बच्चों की शिक्षा दीक्षा पर खर्च होता था। राव अपनी कार में आते जाते थे। निगम की गाड़ी, ड्राइवर का इस्तेमाल कभी नहीं किया। 5 सितंबर 1983 को वह चुने गए। उन दिनों मेयर का कार्यकाल एक वर्ष का होता था। 
  2. बेरोजगार को रोजगार और समाज को भवन दिया साल 1985 से 86 तक श्री कुमार अग्रवाल मेयर बने। पेशे से अधिवक्ता श्रीकुमार कायदे का पालन कराना अच्छे से जानते थे और नियमों का सदुपयोग भी किया। उनके कार्यकाल में सर्वाधिक 293 कर्मचारियों का नियमितीकरण हुआ। ये वे कर्मचारी थे, जो दैनिक वेतनभोगी थे। नई भर्तियां भी निगम में उनके कार्यकाल में हुई। श्री कुमार अग्रवाल को उनके द्वारा विभिन्न सामाजिक संस्थाओं को भवन के िलए प्लाट आवंटित करने के लिए याद किया जाता है। बाद के मेयर ने भी उनका अनुकरण किया। 
  3. जब कांग्रेस और भाजपा के उम्मीदवारों ने मिलकर चुना मेयर 1994 के चुनाव को हमेशा इस रूप में याद किया जाता है कि पहली बार कांग्रेस के 60 और भाजपा के 40 फीसदी पार्षदों के गठजोड़ से मेयर का चुनाव हुआ। उन दिनों नगर पालिक निगम अधिनियम में संशोधन कर पार्षदों में से मेयर चुनने का नियम लागू हो चुका था। कांग्रेस की टिकट से वंचित राजेश पांडेय ने निर्दलीय चुनाव लड़ा। तत्कालीन मंत्री बीआर यादव की पसंदगी पर निर्दलीय पार्षद को मेयर चुन लिया गया। उन दिनों दिग्गज नेताओं में दशहरे पर मुख्य अतिथि बनने की होड़ मची रहती थी। पांडेय ने 1996 में निगम की ओर से दशहरा महोत्सव की शुरुआत की और सामान्य सभा से प्रस्ताव पारित किया कि सिटिंग एमएलए को कार्यक्रम का मुख्य अतिथि बनाया जाएगा। 
  4. वाणी राव प्रथम महिला महापौर 2009 में मेयर वाणी राव प्रथम महिला महापौर बनीं। अजीब इत्तेफाक यह रहा कि सदन में भाजपा का बहुमत था और कांग्रेस अल्पमत में थी। 55 पार्षदों वाले सदन में भाजपा के 33 और कांग्रेस के 18 तथा 4 निर्दलीय प्रत्याशी जीत कर आए थे। जाहिर है कि राव को अपने प्रस्तावों को पारित कराने के लिए बड़ी जद्दोजहद करनी पड़ती थी। उनके कार्यकाल में नगर पालिक निगम अधिनियम में लगातार कई संशोधन हुए। जैसे एमआईसी को भेजे गए प्रस्ताव पर यदि मेयर 10 दिन के अंदर उस पर कोई निर्णय न ले, तो उसे पारित मान लिया जाएगा। एमआईसी के अंतर्गत नए विभाग बनाने के कारण उसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, जिस पर उनके खिलाफ निर्णय हुआ। 
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