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किस परिवार में हों कितने बच्चे, मोदी सरकार करेगी तय, नीति आयोग की बैठक कल, तैयार होगा ड्राफ्ट…

NEWSDESK
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इस साल स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनसंख्या नियंत्रण की बात कही थी। नीति आयोग की बैठक को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। इस बैठक को, “रियालाईज़िंग द विजन ऑफ पापुलेशन स्टेबलाइजेशन: लीविंग नो वन बिहाइंड” यानी जनसंख्या स्थिरता के नजरिए को मूर्त रूप देना, और किसी को पीछ नहीं छोड़ने का शीर्षक दिया गया है। शुक्रवार 20 दिसंबर को नीति भवन में होने वाली इस बैठक को पीएफआई (पापुलेनश फाउंडेशन ऑफ इंडिया) के साथ मिलकर आयोजित किया जा रहा है। इससे यह कयास लगाए जा रहे हैं कि मोदी सरकार आने वाले दिनों में परिवार नियोजन की कोई योजना सामने ला सकती है, जिसमें किसी भी भारतीय परिवार में बच्चों की संख्या निर्धारित की जाएगी। हालांकि अभी तक इस बारे में कोई स्पष्टता नहीं है कि एक आदर्श परिवार का आकार क्या होना चाहिए।

इस बैठक में चर्चा के आधार पर नीति आयोग एक वर्किंग पेपर तैयार करेगा जिसमें जनसंख्या नियंत्रण का एक व्यापक योजना सामने रखी जाएगी। ध्यान रहे कि इस समय देश की आबादी 1 अरब 37 करोड़ के आसपास है और भारत जनसंख्या के लिहाज से चीन के बाद दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश है।

इस बैठक से माना जा सकता है कि सरकार कोई जनसंख्‍या नियंत्रण कानून लाने की तैयारी कर रही है, लेकिन क्या इस कानून के तहत एक परिवार में दो ही बच्चों का नियम होगा, अभी स्पष्ट नहीं है। वैसे भी बिना किसी कानून के ही भारत के अधिकतर परिवार दो बच्चों की नीति ही अपनाए हुए हैं। साथ ही बहुत से परिवार तो सिर्फ एक ही बच्चे की नीति पर अमल कर रहे हैं।

आंकड़ों के हिसाब से देखें तो नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 2015-16 बताता है कि देश में प्रति महिला प्रजनन क्षमता 2.2 पर आ गई है जो कि 2005-06 में 2.7 थी। यानी पहले की तुलना में अब प्रजनन दर में गिरावट आयी हैं। इसके अलावा शहरी महिलाओं में यह दर 1.8 बच्‍चा प्रति महिला है, जबकि ग्रामीण महिलाओं में 2.4 है। सिक्किम की महिलाओँ की प्रजनन दर सबसे कम 1.2 है जबकि बिहार में सबसे ज्यादा 3.4 है।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे में धार्मिक आधार पर आंकड़े देखें तो हिंदुओं में प्रजनन दर 2.1 है, जबकि मुस्लिमों में 2.6। पिछले आंकड़ों पर गौर करें तो सामने आता है कि 1992-93 में प्रति महिला 3.8 बच्चों का औसत था। इस तरह बीते करीब 30 साल में ये औसत 1.4 कम हुआ है। रोचक है कि हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों में बच्चे पैदा करने की संख्या का अंतर घटा है। यानी दोनों ही समुदायों में जनसंख्या नियंत्रण करने में जागरुकता बढ़ी है।

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