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करगिल युद्ध के 20 साल: इज़राइल ने ऐसे की थी भारतीय सेना की मदद

NEWSDESK
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भारतीय वायुसेना (IAF) करगिल युद्ध में विजय के 20 साल पूरे होने का जश्न मना रही है. यही वह मौका था, जब भारत ने ऑपरेशन सफेद सागर के जरिए पाकिस्तान को उसके दुस्साहस का सबसे बड़ा सबक सिखाया था. करगिल के लिए सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ चलाया था. इस युद्ध में इज़राइल ने भारत की खास मदद की थी. जुलाई 1999 में भारतीय सेना ने जंग में दुश्मन का सामना करने के लिए मिराज विमानों में इजराइली किट का इस्तेमाल किया था, जिसे इजरायल लिटनिंग लेजर डिज़ाइनर पॉड कहते हैं. ये एक अदृश्य बीम के साथ लक्ष्य को भेदता था. इस बीम के रास्ते को अनिवार्य तौर पर लेजर-निर्देशित बम द्वारा फॉलो किया जाता था. बम लेजर को ट्रैक करते हैं और प्रभाव के सटीक पॉइंट पर उड़ान भरते हैं. 

आइए जानते हैं, करगिल युद्ध में इज़राइल ने कैसे की थी भारत की मदद:-

कब शुरू हुई थी जंग?

24 जून 1999 को विंग कमांडर रघुनाथ नाम्बियार के नेतृत्व में मिराज 2000 विमानों ने टाइगर हिल पर पाकिस्तानी सेना की तरफ लिटनिंग पॉड के जरिए बम गिराए. भारतीय वायुसेना के इस हमले के कुछ मिनट बाद लक्ष्य को ध्वस्त कर दिया गया. इस जंग में भारतीय वायुसेना ने पहली बार लेजर निर्देशित मूनिशन का इस्तेमाल किया था, जिसे इज़राइल ने मुहैया कराया था.

यह पहला मौका था, भारतीय वायुसेना ने लेजर गाइडेड बमों का इस्तेमाल किया. इसी दिन एक और मिशन में एयरफोर्स ने अनगाइडेड बम भी गिराए. इस हमले ने पाकिस्तान को बड़ा नुकसान पहुंचाया. तोलोलिंग पहाड़ी को मुक्त कराने के अलावा टाइगर हिल पर एयरफोर्स का अभियान ऐसा था, जिसे भारतीय खेमे को सबसे ज्यादा बढ़त थी.

जंग के दो साल पहले इज़राइल से हुई थी डील
उस दिन को याद करते हुए भारतीय वायुसेना के पश्चिमी वायु कमान के एयर मार्शल नाम्बियार बताते हैं, ‘लिटेनिंग पॉड और 1,000 पाउंड लेजर निर्देशित बमों के यूनीफिकेशन (एकीकरण) को 12 दिनों में पूरा किया गया था.’ नाम्बियार आगे बताते हैं, ‘इज़राइल ने करगिल वॉर शुरू होने के दो साल पहले 1997 में भारत के साथ इजराइल पॉड के लिए एक डील की थी. इसके तहत जगुआर विमा के लिए 15 और मिराज 2000 के लिए 5 पॉड खरीदे जाने थे. इनका इस्तेमाल अमेरिका की ओर से सप्लाई की गई पेववे लेजर गाइडेड बम किट के साथ किया जाना था.

हालांकि, 1998 में पोखरण परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका ने प्रतिबंध लगा दिए. ऐसे में भारत कभी भी उन फ्यूज को पा नहीं सका, जिन्हें पेववे बमों के काम करने के लिए हासिल करना बहुत जरूरी थी.

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